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6 दिन के चतुर्वेद स्वाहाकार महायज्ञ का हुआ अच्छा अंत

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नई दिल्ली, ।अशोक सिंघल फाउंडेशन व विश्व हिन्दू परिषद एवं झण्डेवाला देवी मंदिर के तत्वावधान में लक्ष्मी नारायण मंदिर (बिड़ला मंदिर) में छह दिन के चतुर्वेद स्वाहाकार महायज्ञ कार्यक्रम का अच्छा समापन सोमवार को हुआ। इस कार्यक्रम में विभिन देशों और देश के सभी प्रांतों से वेदों को मानने वाले लोग और सनातन धर्म में विश्वास रखने वाले भक्त शामिल हुए। श्री त्रिदंडी स्वामी रामानुजाचार्य जियर चिन्न स्वामी ने अपने इकसठ वेदपाठियों के साथ विस्तार ढंग से वेद से जुडी हुई 6 दिन के आयोजन में होने वाली सारी प्रक्रिया पूरी की। उन्होंने वेद मंत्र को याद रखे हुए वेदपाठी, विद्वानों के साथ विभिन यज्ञ कुंडों में शुद्ध और अच्छे स्वर के साथ उच्चारण करते हुए यज्ञ में पूरी आहुति देकर वेद भगवान यज्ञ का अंत वैदिक विधि विधान पूर्वक किया।

दिनेश चन्द्र विश्व हिन्दू परिषद की प्रबन्ध समिति के सदस्य ने बताया कि यह यज्ञ विश्व के अच्छे के लिए है। वेद के विषय में अनेक प्रकार अंधविश्वास फैली हैं जैसे महिलाएं वेद पढ़- नहीं सकतीं सुन, नहीं सकतीं , कोई विशेष वर्ग नहीं सुन सकता, बल्कि यह सच नहीं है। दिनेश चन्द्र ने बताया कि यजुर्वेद के 26वें मंडल के दूसरे पाठ  में पूरी तरह उल्लेखित है कि वेदों का ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, नारी, सेवक कोई भी सुनने वाला , अध्ययन और पढ़ सकता है और किसी को भी उसको सुना सकता है। वेद के बारे में फैले अंधविश्वास आदि को दूर करने के लिए दिल्ली में पहली बार ऐसा महायज्ञ हो रहा है। सामाजिक समरसता की द्रष्टि से भी यह ऐतिहासिक है, इसमें सारे वर्गके लोगो, झुग्गियों से लेकरबड़े-बड़े महलों मे रहने वाले अलग प्रकार के समाज के नेता, धर्म के नेता, राज करने वाले नेता, सभी को बुला गया है वे सब शामिल भी हुए। दिनेश चन्द्र ने कहा कि स्वामी विवेकानन्द वेदों को समाज का आइना समझने की कला मानते थे और उन्होंने कहा कि अगर आज ‘हमारी संस्कृति बचेगी तभी हमारा भविष्य और भविष्य की संततियां बचेगी।’

इस बड़े आयोजन में अमेरिका, आस्ट्रेलिया, इंग्लैण्ड, नार्वे, थाईलैण्ड, सिंगापुर के साथ अनेक देशों के वेद को मानने वाले श्रद्धालु शामिल हुए तथा उन्होंने अपने-अपने प्रांतो में चतुर्वेद महायज्ञ करने के लिए संतों से आग्रह किया। हॉलेण्ड के प्रिंस लुईस के साथ सभी विदेशी मेहमानो ने वैदिक वेश भूषा में उपस्थित होकर पूजा अर्चना की।चिदानन्द महाराज ऋषिकेश से आए उन्होंने ने इस महायज्ञ का लक्ष्य बताते हुए कहा कि “ग्लोबल वामिर्ंग के कारण विश्व में वैष्मयता बढ़ रही है, प्रकृति में प्रतिकूलता बढ़ रही है तो हम ऐसा मानते हैं कि यज्ञ के माध्यम से धरती, आकाश, आग, पानी, हवा, निहारिका, नक्षत्रों का संतुलन बनेगा और प्राणियों में अच्छी भावना  उत्त्पन होती है।”