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Journalism की बात जाने माने प्रोफेसर नितिन सक्सेना जी के साथ

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Journalism की बात जाने माने प्रोफेसर नितिन सक्सेना जी के साथ
नितिन सक्सेना जो इन दिनों Sharda University के अनुबंधन अध्यापक हैं जिन्होंने अपना अभी तक का सारा जीवन सिर्फ और सिर्फ रवनतदंसपेउ को ही समर्पित कर दिया।

आज नितिन जी बता रहे हें कितने फायदे हैं जर्नलिज्म करने के और क्या-क्या सुविधाएँ मुहैया कराती है सरकार अपने पत्रकारों को। नितिन जी का कहना है कि पत्रकारिता हमारे संविधान का वह स्तंभ है जो बेहद मजबूती से सभी को जीने का, स्वतंत्र रहने का अधिकार देता है। पढ़िए नितिन सक्सेना जी की बातचीत क्रंची न्यूज के साथ।

Journalism

पत्रकारिता की आम आवाम के लिए क्या परिभाषा है?
Journalism आम आदमी के लिए एक वो सच्चाई है जो दिखाई जा रही है या बताई जा रही है। बात ये है कि जनता खबरों को सुनने के लिए भी तत्पर रहती है और उन पर विश्वास करना भी जानती है।

जिस तरह भोपाल सरकार ने खासतौर पर पत्रकारां के लिए अलग-अलग बीमा, मेडिक्लेम और पीएफ सुविधा दी है। इसी प्रकार दिल्ली सरकार क्या फायदे देती है?

दिल्ली सरकार या भारत सरकार पत्रकारों को काफी सुविधा दे रही है किन्तु अब तरीके थोड़े बदल भी रहे हैं और वो भी उन पत्रकारों के लिए जो फेक हैं सरकार कई प्रकार के फायदे देने के तरीकों पर अंकुश लगा रही है। बाकी फायदे जैसे किः
1CGHS कार्ड बनाना
2.हाउसिंग की सुविधा
3.किसी भी सरकारी कार्यालय में जाने की अनुमति
4.पार्लियामेन्ट में या अन्य जगहों पर होने वाली डिबेट या अन्य खबरों की प्रथम जानकारी
5.50%की छूट रेलवे में सफर करने पर मीडिया क्लब के अन्तर्गत सस्ता सामान मुहैया कराना।
6.सरकारी अस्पतालों में विशेष छूट आदि।

आजकल अलग-अलग डिग्रीयों के बीच श्रवनतदंसपेउ की डिग्री या वर्कशाॅप करने के क्या करियर आॅपशन हैं?
मीडिया में रवनतदंसपेउ की डिग्री की बहुत विशेषता है। यह डिग्री लेने के बाद आप ब्राॅडकास्ट, रेडियो प्रोडक्टिविटी प्रोग्राम या फिक्शन में आगे जा सकते हैं। डिग्री मिलने के बाद आप चुन सकते हैं अपना करियरः फिल्म इंडस्ट्री में, एडवरटिजमेंट, काॅपी राईटर, विज्यूलाईजर या मीडिया प्लानिंग में।

मीडिया हमारे संविधान के यार स्तंभों में से एक है। लेकिन क्या आजकल भी यह सत्य रह गया है। या दिन-प्रतिदिन इसका पतन हो रहा है?

जी हाँ मीडिया हमारे संविधान का चैथ स्तंभ है और यह कहना कि इसका पतन हो गया है सरासर गलत होगा क्योंकि इसकी भूमिका अभी भी बरकार है और बरकरार रहेगी। बस फर्क यह है कि लोगों को फिजूल बातें करने की आदत हो गई है कि पतन हो गया है, खबरें बिकती हैं या खबरों का कोई स्टैण्डर्ड नहीं है इत्यादिं जबकि सच यह हे कि आज भी यदि कोई गलत करता

दिखता है चाहे वो नेता ही क्यों ना हो, खबर छपती है चाहे न्यूजपेपर राष्ट्रीय हो या लोकल क्योंकि इस दृष्टि में छोटे अखबारों की भूमिका भी बड़ी उज्जवल रही है। इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण अभी ही आपके सामने है गुरमीत राम रहीम सिंह उर्फ डेरा सच्चा सौदा।

जिस तरह आजकल टी.वी. पर डिबेट के नाम पर सिर्फ टीआरपी बटोरी जाती है सब कुछ शोरगुल प्रीप्लैन्ड होता है इस संबन्ध में आप क्या कहेंगे। यह कहाँ तक सत्य है?

जी यह बिल्कुल सही प्रश्न है डिस्कशन्स सिमित हैं एक ही आदमी बार-बार अलग-अलग चैनल पर दिखाई देता है। वो डिस्कस करता है एग्रेशन है। एग्रेसिव श्रवनतदंसपेउ। आपके पास शोर है, चीखना है, चिल्लाहट है लेकिन आरग्यूमेंटस का लाॅजिक नहीं है। इसलिए हमलोग आज एक न्यूज की भूख रखने वाला राष्ट्र नहीं बल्कि रोमांच की भूख रखने वाला राष्ट्र बनते जा रहे हैं। आज के समाचार में एक जोश दिखाया जा रहा है टी.वी. चैनल्स जोश में आकर कहते हैं कि एस लड़की का बलात्कार हो गया। और प्रिन्ट मीडिया में आने वाली हेडलांइस होती है।

‘‘गर्ल रेप्ड’’! आप क्या कर रहें हैं आप हर चीज में भावुक्ता फैला रहे हैं। आपके पास चर्चा में कोई समाधान नहीं है आपके पास ढेरों समस्याएं है जो आगे बढ़ती ही हैं आप क्या दिखाना चाहते हैं। टीआरपी वो टीआरपी जो शहरी सोच या वोटर्स को प्रभावित नहीं करती है।

आज के समय में जनता सूचना कहाँ चाहती है वो चाहती है हर चीज में रोमांच आलिया भट्ट का अफेयर, आलिया भट्ट का रणवीर कपूर के साथ देखा जाना न्यूज है? क्या किसी ने तथ्यों की तरफ ध्यान दिया नहीं? इसलिए आज के न्यूजचैनल्स शोरगुल की दुकान बनते जा रहे हैं।